हमारा अवचेतन मन सफलता में साझेदार है जिसकी तीन पायदानें हैं! पहली पायदान उस काम का पता लगाना और करना है जिससे हम प्रेम करते हैं! जबतक हम अपने काम में प्रेम न करते हों तबतक संभवतः हम उसमें खुद को सफल नहीं मानेंगे भले ही दुनिया हमें बहुत सफल कहती रहे! काम से प्रेम होने पर हमारे मन में उसे करने की गहरी इच्छा होती है! सफलता की दूसरी पायदान काम की किसी विशिष्ट शाखा में विशेषज्ञता हासिल करना और उसमें उत्कृष्ट बनने की इच्छा रखना है! तीसरा कदम सबसे महत्वपूर्ण है! हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम जो करना चाहते हैं वह सिर्फ हमें ही सफल न बनाए! हमारी इच्छा स्वार्थपूर्ण नहीं होनी चाहिए! इससे मानवता को लाभ होना चाहिए! सर्किट पूरा होना चाहिए! अगर हम सिर्फ अपने ही लाभ के लिए काम करते हैं तो हम इस अनिवार्य सर्किट को पूरा नहीं करते हैं! हो सकता है कि हम सफल नजर आएँ लेकिन हमने अपने जीवन में जो शॉर्ट-सर्किट किया है वह आगे चलकर सीमा या बिमारी की ओर ले जा सकता है!
।। श्री परमात्मने नमः।।
Sunday, 6 May 2018
सफलता के साझेदार
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