आध्यात्मिक व्यक्ति दूसरों में उसी आत्मा के दर्शन करता है, जो स्वयं उसके हृदय में विराजमान रहता है। वह अपना प्रेम करुणा और सहानुभूति दूसरों पर उड़ेलता चलता है।उसके आत्मभाव का दायरा अति विस्तृत रहता है, जिसमें न केवल मनुष्य, प्रत्युत अन्य जीव भी सम्मिलित होते हैं।
।।श्री परमात्मने नम:।।
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