विश्वात्मा भगवान के अनन्तरूप ही जगत के सब प्राणी हैं और वह विश्वात्मा भगवान ही इन सब प्राणियों की विविध-विचित्र क्रियाओं के रूप में अपनी लीला कर रहा है | वह स्वयं अपने-आप ही, अपने-आपसे ही, अपने-आप में ही और अपने-आप बने हुए खिलौनों से सदा खेल रहा है |
।।श्री गणेशाय नम:।।
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