यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन का तीन चौथाई हिस्सा गलत कार्यों में खर्च कर दिया है तो भी वह शेष बचे समय में सद्कर्म या जनहित के कार्य करके पश्चाताप कर सकता है क्योंकि दु:ख-दर्द तो सभी मानव के जीवन में है परंतु जो अपने दु:खों को ही सबसे बड़ा और जटिल मान लेता है उससे जनहित के कार्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वास्तव में वही जनहित के बारे में सोच सकता है जो दूसरों के दुःखों को महसूस करे और उनके सामने अपने दु:ख को भूल जाए।
।।श्री परमात्मने नमः।।
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