नमस्कार!
संप्रति लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र रही है। फेसबुक, ह्वाट्सेप, मैसेंजर, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इत्यादि जो भी सोशल मीडिया हैं सबके-सब हमारी नज़र से बकबास हैं। आज मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि कहीं किसी पदाधिकारी के पास, सत्ताधारी कार्यकर्त्ता के पास, प्रशासन के पास या किसी पार्टी कार्यकर्त्ता के पास किसी प्रकार के शिकायतों का आवेदन देना मूर्खता है। इस देश अथवा राज्य में लोग केवल और केवल अपने स्वार्थ के वशीभूत हो परस्पर प्रेमाभिवादन का स्वांग रचते हैं। प्राय: लोग अर्थ के पीछे-पीछे भागते नजर आ रहे हैं। पारस्परिक आलोचना या प्रत्यालोचना भी लोग स्वार्थिक लिप्सा से अभिभूत होकर ही जीवन जीने की अपनी-अपनी शैली के आगोश में जीने को विवश हैं। कहीं भी व्यावहारिकता का समावेश नहीं है। सिद्धांत और व्यवहार में सामंजस्य नहीं है। कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। इन्हीं झंझावातों के बीच जीवन-बसर भी करना है। फेसबुक के एक वरिष्ठ मित्र मित्र ने आज मेरी आँखें खोल दी। मैं उनका आजीवन शुक्रगुजार रहूँगा वह इसलिए कि उन्होंने मेरे बेमतलबी समय की बर्बादी से मुझे बचा लिया। उनकी टिप्पणी में जान थी।
अंत में मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि मैं अब फेसबुक पर किसी प्रकार की पोस्टिंग नहीं करूंगा क्योंकि मैं लोगों के उपहास से बच सकूंगा। यह हमारी अंतिम पोस्टिंग है। धन्यवाद....!
।। श्री परमात्मने नमः।।
Tuesday, 12 December 2017
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