Monday, 12 March 2018

सर्वोदय

हमारा मस्तिष्क बुरा नहीं है। प्रकृति की कोई भी शक्ति बुरी नहीं है। हाँ, यह हमपर निर्भर है कि हम प्रकृति की शक्तियों का कैसा प्रयोग करते हैं। ग्रामीण-परिवेश में हम अक्सर व्यक्तिगत स्वार्थ को लेकर सामने वाले को तुच्छ समझते हैं और अपने कार्य-सिद्धि हेतु असामाजिक गतिविधियों का तरजीह देने लगते हैं। वह यह कि दूसरे के कार्यों को गलत ठहराते हैं और उसी कार्य को स्वयं द्वारा संपादित होने पर उसे आदर्श मानते हैं। नतीजतन ग्रामीण-परिवेश में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की परिकल्पना धूमिल होती जा रही है। हमें सर्वोदय की भावना से प्रेरित होकर अपने कार्यों का संपादन करना चाहिए।
।। श्री परमात्मने नमः।।

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