अपनी कमाई को आप ही खा जानेवाले को शास्त्रों में चोर माना गया है। अत: हमारा जीवन केवल स्वार्थ के लिए ही नहीं परमार्थ में भी लगना चाहिए क्योंकि मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों के अतिरिक्त मिला हुआ है वह श्रेष्ठ सत्पुरुषों के श्रम और त्याग का ही फल है। अत: संसार सत्प्रवृतियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियम्त रुप से लगाया जाना चाहिए।
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