जिसके चित्त में असंतोष व अभाव का बोध है वही दरिद्र है, जिसकी चित्तवृत्ति विषयों में आसक्त नहीं है वह समर्थ-स्वतंत्र है और सदा शांति की अनुभूति करता है।
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