परमात्मा से मिलने पर ही शान्ति मिलती है। यह शरीर पृथ्वी का अंश है तो जब तक यह पृथ्वी में नहीं मिल जाता तब तक चलता-फिरतारहता है। अन्त में मरकर यह मिट्टी में मिल जाता है। यह पृथ्वी में ही पैदा होता है, पृथ्वी में ही रहता है और पृथ्वी में ही लीन हो जाता है। यह पृथ्वी को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता इसी तरह जीव को जब तक परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती तब तक इसकी यात्रा चलती ही रहेगी। यह जन्मता-मरता ही रहेगा, दु:ख पाता ही रहेगा। इसको कहीं शान्ति नहीं मिलेगी इसलिये मनुष्य को अपनी जो असली जिज्ञासा और लालसा है उसको जाग्रत करना चाहिये।
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