भक्ति तभी संभव है जब कोई भी मांग न हो, जब कोई अपेक्षा न हो, जब स्वयं का कोई विचार ही न हो सब कुछ मौन में परिवर्तित हो जाये, कहने को कुछ शेष रहे ही ना, शब्द उनकी कृपा में विलीन हो जाये।
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