Monday, 31 October 2016

अखिल सत्य

हमारा जीवन इसलिए है कि अखिल सत्य तत्त्व में विचरण करते हुए अमृत का पान करें। प्रभु ने कृपा करके हमें अपने संसार की सत्यरूपी वाटिका में भ्रमण करके आनंद लाभ करने के लिए भेजा है, परंतु हाय, हम तो अपने को बिलकुल ही भूले जा रहे हैं। वास्तव में दुनिया कुछ नहीं है। अपनी छाया ही संसार के दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही है।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Sunday, 30 October 2016

प्रेरणा

'सत्य’ मनुष्यों को प्रेरणा देता है कि अंतर में दृष्टि डालो,अपना दृष्टिकोण बदलो,अपना और दुनिया का स्वरूप समझो, अपने को अच्छा बना डालो, बस सारी दुनिया तुम्हारे लिए अच्छी बन जाएगी। तुम सत्यनिष्ठ बनो, दुनिया तुम्हारे साथ सत्य का आचरण करेगी। श्रुति कहती है 'असतो मा सद्गमय 'असत्य की ओर नहीं, सत्य की ओर गमन कीजिए। आपका इसी में कल्याण है।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Saturday, 29 October 2016

सत्य की अवहेलना

कितना सुंदर शब्द है, सत्य! उच्चारण करते ही जिह्वा को शांति मिलती है, विचार करते ही मस्तिष्क शीतल हो जाता है, हृदयंगम करने से कलेजा ठंडक अनुभव करता है परन्तु आज का मानव झूठ के मायावी प्रपंचों में उलझ कर  मानवता से पतित हो पशुवत् बन गया है। आज वह सत्य की अवहेलना करने का अभिशाप भुगत रहा है।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Friday, 28 October 2016

संकल्प

प्रत्येक मानव को अपने जीवन में दृढ़ इच्छा शक्ति से कम से कम एक संकल्प लेकर उसका पूर्ण मनोयोग से पालन जरुर करना चाहिए ताकि वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Wednesday, 26 October 2016

*भगवान-भरोसे*

आजकल भगवान के *नाम-स्मरण* में भी ठेकेदारी की प्रथा चल पड़ी है। ऐसा लगता है कि भगवान भी अब अर्थ के गिरफ्त में आ चुके हैं पर यह लोगों की भूल है। उनका कल्याण भी अब होगा *भगवान-भरोसे* ।

Tuesday, 25 October 2016

तृष्णा

झूठी भूख अनावश्यक तृष्णा है।अत:इसके मायाजाल से दूर रहना ही सफल होने का साधन है।आध्यात्मिकता ही इसे दूर कर सकती है।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Monday, 24 October 2016

सच्चा अध्यात्म

आध्यात्म हमारी झूठी भूख को दूर कर सच्ची और सात्विक भूख को जन्म देता है। हमारी वासनाओं को दग्ध करता है।वह हमें पवित्रता की ओर उन्मुख करता है।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Sunday, 23 October 2016

केवल परमात्मा है

यह सृष्टि परमात्मा से भिन्न नहीं है यह उसका नृत्य है तो परमात्मा नर्तक है। यह सृष्टि  उसकी कृति नहीं है। यह कोई बनायी हुई मूर्ति नहीं कि परमात्मा ने बनाया और वह अलग हो गया बल्कि परमात्मा इसके भीतर मौजूद है। वह अलग हो जाएगा तो नर्तन बंद हो जाएगा और नर्तन बंद हो जाएगा फिर परमात्मा भी खो जाएगा।
।।श्री परमात्मने नम:।।

Saturday, 22 October 2016

कनिष्ठा का महत्व

छोटी उंगली – The Little Finger- छोटी ऊँगली का किडनी और सिर के साथ सम्बन्ध होता है। अगर आप को सिर में दर्द है तो इस ऊँगली को हल्का सा दबाये और मसाज करे ,आप का सिर दर्द गयब हो जायेगा ।इसे मसाज करने से किडनी भी तंदुरुस्त रहती  है और हम स्वस्थ रहते हैं।

Friday, 21 October 2016

अनामिका का महत्व

चौथी उंगली– The Ring Finger- ये ऊँगली आपकी मनोदशा से जुड़ी होती है।अगर किसी कारण आपकी मनोदशा अच्छी नहीं है ,या शांति चाहते हैं तो इस ऊँगली को हल्का सा मसाज करें और खीचें ,आपको जल्द ही इसके अच्छे नतीजे प्राप्त हो जायेंगे ,आप का मन खिल उठेगा।

Thursday, 20 October 2016

मध्यमा का महत्व

बीच की ऊँगली -The Middle Finger- ये ऊँगली परिसंचरण तंत्र तथा circulation system से जुड़ी  होती है । अगर आप को चक्कर या आपका जी घबरा रहा है तो इस ऊँगली पर मालिश करने से तुरंत रहत मिलेगी।

Wednesday, 19 October 2016

तर्जनी का महत्व

तर्जनी -The Index Finger – ये ऊँगली आँतों ( gastro intestinal tract) से जुड़ी होती है।
अगर आपके पेट में दर्द है, तो इस उंगली को हल्का सा रगड़े , दर्द कम हेता महसूस होगा।

Tuesday, 18 October 2016

स्वास्थ्य

अंगूठा (The Thumb)– हाथ का अँगूठा हमारे फेफड़ों से जुड़ा होता है।अगर आप की दिल की धड़कन तेज है तो हलके हाथों से अँगूठे पर मसाज करें और हल्का सा खिचें। इससे आप को आराम मिलेगा।

योग

योग में तो संपूर्ण शरीर को ही विभक्त कर दिया गया है : मन का एक हिस्सा पुरुष है, मन का दूसरा हिस्सा स्त्री है। और व्यक्ति को सूर्य से चंद्र की ओर बढ़ना है, और अंत में दोनों के भी पार जाना है, दोनों का अतिक्रमण करना है। यही वास्तविक योग है।

Sunday, 16 October 2016

जीवन-क्लेश

''गणपति" नाम के उच्चारण से जो करते दिन का श्रीगणेश,
दर पर कभी न दुविधा आयेऔर दूर हो
"जीवन-क्लेश"।

Saturday, 15 October 2016

ऊर्जा और शक्ति

शरीर को पोषित करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है लेकिन जीवन के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। ऊर्जा को एकत्रित करना होता है जबकि शक्ति को जाग्रत करना होता है। ऊर्जा शरीर का विषय है , शक्ति मन या अध्यात्म का विषय है। एक शक्ति से बहुत सी दूसरी शक्तियों का और ऊर्जाओं का सृजन होता है।

Friday, 14 October 2016

जीवन का विवेचन

विवेक--विरोधी, संबंध, विश्वास और कर्म का त्याग कर देने पर ही दुख--निवृत्ति, परम शांति, अमरत्व एवं सरसता प्राप्त कर सकते हैं।

Thursday, 13 October 2016

माँ ही एक सहारा

               ।।जय माता दी।।
यहाँ कोई नहीं अपना, माँ तेरा ही इक सहारा है।
मैंने देख लिया सबको तभी तो
संसार को तिलांजलि देकर
हारकर अब माँ तुम को पुकारा है।
कहीं डूब ना जाऊ मैं,
माँ मेरा हाथ पकड़ रखना।
माँ सदा मुझ पर रहमत की नज़र रखना।

Wednesday, 12 October 2016

धर्म-युद्ध

मानव को अपना धर्मयुद्ध अपने आस-पास और अपने भीतर जरूर लड़ना पड़ता है जिसके लिए सबसे पहले अपने भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार से लड़ना पड़ता है।

Tuesday, 11 October 2016

आत्म-संतुष्टि

प्रकृतिवत् परोपकारी बनने से मानव आत्म-संतुष्टि प्राप्त करता है जिसे धन-संपदा से  खरीदा नहीं जा सकता.

Monday, 10 October 2016

नि: स्वार्थ-भाव

निःस्वार्थ भाव से की गई किसी की सेवा और प्रार्थना किसी न किसी रास्ते से ईश्वर तक पहुँच ही जाती है।

Sunday, 9 October 2016

भक्ति

व्यक्ति यदि मुक्ति की अभिलाषा रखता हो तो उसे भक्ति का सानिध्य प्राप्त करना चाहिए।

Saturday, 8 October 2016

उपयुक्त मानव

ऊँच्च से ऊँच्च जीवन्मुक्त अवस्था स्वाभाविक होने पर ही मानव, उपयुक्त मानव बन पाता है ।

Thursday, 6 October 2016

परमात्म-मिलन

आज का आदमी बिना श्रम के, बिना चेष्टा के परमात्म-मिलन चाहता है पर यह परमपिता परमेश्वर की अनुकंपा के बिना संभव नहीं है।

Wednesday, 5 October 2016

यथार्थ-बोध

समय ,सत्ता ,सम्पति और शरीर चाहे साथ दें या न दें ! लेकिन स्वभाव ,समझदारी ,सत्संग और सच्चे संबंध हमेशा साथ देते हैं !.
ना किसी के 'अभाव' में जियो
ना किसी के 'प्रभाव' में जियो
ये जिंदगी आपकी है
बस इसे अपने मस्त 'स्वभाव' में जियो.
।।जय माता दी।।

Tuesday, 4 October 2016

मुक्त पुरुष

जब हृदय शुद्ध होता है
तो पक्ष और विपक्ष का ख्याल नहीं आता
न कोई अभिमान न अनिवार्यताएं
न आवश्यकताएं और न आकर्षण
तब आपके सभी काम
आपके नियंत्रण में होते हैं
आप एक मुक्त मनुष्य हैं।

परमात्मा

बेवजह सदा झुकना
ठीक नहीं,
यदि सदा झुकना ही है तो
परमपिता परमेश्वर के सामने
क्योंकि वे कभी-भी हमारा
अहित नहीं सोचते।
।। श्री परमात्मने नम: ।।