हम उतने ही युवा हैं जितना खुद को मानते हैं! बुढ़ापा बुद्धि का उदय है! मस्तिष्क और आत्मा कभी बूढ़े नहीं होते! हमारा चरित्र, हमारे मस्तिष्क की गुणवत्ता, हमारी आस्था और हमारे विश्वास नश्वर नहीं हैं! हमारे सफेद बाल संपत्ति हैं! कभी भी यह सोचकर किसी अवसर से मुँह न मोड़ें, "मेरी उम्र इतनी ज्यादा है कि इसका लाभ नहीं ले सकता!" इस सोच का नतीजा ठहराव और मानसिक मृत्यु है! अगर हम विश्वास कर लेते हैं कि हम खत्म हो चुके हैं तो हमारा अवचेतन मन उस विश्वास को स्वीकार कर लेगा और उसे हकीकत में बदल देगा! कुछ लोग तीस साल की उम्र में ही बूढ़े हो जाते हैं जबकि कुछ अस्सी साल में भी युवा रहते हैं! मस्तिष्क ही सबसे बड़ा बुनकर, आर्किटेक्ट, डिजाइनर और मूर्तिकार है! नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ नब्बे साल की उम्र में सक्रिय थे और उनके मस्तिष्क की कलात्मक गुणवत्ता कभी शिथिल नहीं हुई!
।। श्री परमात्मने नमः।।
Monday, 22 October 2018
बुद्धि का उदय
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