Wednesday, 8 November 2017

आस

समाये मेरी हस्ती में, निगाह और दिल में लहराये,
जो इतनी दूर जाना था तो इतने पास क्यूं आये?
जनम जनमों का नाता है ये खुद तुमने बताया था
तभी झाँका था मैं दिल में जहाँ बस तुम नजर आये ।
तुम बिन कैसे कटे उमरिया आस ही आस में बीती जाये,
मोरे नैन दरश बिन तरसे तुम बिन गुरुवर कछु न सुहाये।
तोरी प्रीत के कारण हाय मोसे रूठे अपने पराये
जग चाहे रूठे तुम मत रुठियो, तुम रुठियो तो गजब हुई जाये....तुम रुठियो तो गजब हुई जाये...
।। श्री परमात्मने नमः।।

Monday, 6 November 2017

लोग

भीतर विष लेकिन बाहर से हाथ मिलाकर हँसते लोग
आँखों में लेकर मिलते हैं नफरत के गुलदस्ते लोग
औरों के गुण-दोष हमेशा छलनी में से छान रहे
पर अपने गुण-दोष कसौटी पर जा कभी न कसते लोग
शीतल जल से भरी घटा तू कब बरसेगी धरती पर
कार्तिक-दुपहरी से झुलसाए जल को आज तरसते लोग
कहने को तो लाखों में भी बिकने को तैयार नहीं
अवसर मिलने पर बिक जाते कौड़ी से भी सस्ते लोग
रूप सुरक्षित रह सकता तो पर्दे में ही रह सकता है
जब भी रूप उठाये पर्दा बनकर तीर बरसते लोग
जाने-पहचाने चेहरे भी अनजाने से लगते हैं
दिन का उजियाला है फिर भी अंधकार में बसते लोग
सूरज चढ़ता है तो मुख पर और मुखौटे होते हैं
सूरज छिपता है तो मुख पर और मुखौटे कसते लोग
पहले तो 'दिवाकर' तुम्हारी 'हाँ' में 'हाँ' सब कहते थे
अब क्यों तुमको छोड़ चले हैं अपने-अपने रस्ते लोग?
।। श्री परमात्मने नमः।।

शिकायत

ग्राम+पोस्ट गोपालबाद,वाया सरमेरा, जिला नालंदा, राज्य बिहार की स्थति फिलहाल बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है। इस गाँव में बराबर अप्रिय घटना घटित होते रहती है परन्तु संबंधित पंचायत के सारे जनप्रतिनिधि घटनाओं को नजरंदाज करते रहते हैं। बेचारे शंकर प्रसाद पर कैसी गुजरती होगी उनके आवेदन से ही अंदाजा लगाया जा सकता है। यह गाँव बिहार-सरकार के लिए एक चुनौती है। देखिए उक्त किसान के शिकायतों पर कब, कितना, कहाँ, किस प्रकार और किनके द्वारा अमल किया जाता है?

Saturday, 4 November 2017

चोरी का पत्थर

नमस्कार!
मैं भले ही पत्थर का टुकड़ा हूँ पर थोड़ा-सा स्वार्थ को लेकर मानव मुझे पाने के लिए विद्या-मंदिर के ताले को तोड़कर मुझे चुरा लेता है। मुझे अफसोस इस बात की है कि अभीतक उस चोर ने मुझे लावारिस सड़क पर छोड़ रक्खा है। उस चोर से मेरी गुजारिश है कि मुझे जिस काम के लिए चुराकर लाया गया है, कृपया उस काम में यथास्थान शीघ्रातिशीघ्र स्थापित कर दे क्योंकि अब मुझसे असहनीय दर्द सहा नहीं जा रहा है वह यह कि सड़क पर दौड़ रहे वाहनों से मैं बुरी तरह कुचला जा रहा हूँ। शायद वह चोर डरकर मुझे सड़क पर लावारिस रूप में छोड़ दिया हो पर यह उसकी भूल है। मैं जानता हूँ कि वर्तमान में उस चोर को पकड़ने वाला कोई नहीं है क्योंकि पंचायत के सारे जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर नहीं है। वे स्वयं उधेड़बुन में हैं कि किस तरह जनता और सरकार को चूना लगाया जाय। मैं तो प्रशासन और सरकार के लिए भी एक चुनौती के रूप में यहाँ पड़ा हूँ। यथास्थान स्थापित होने के इंतजार में....!
निरंकार से भी मेरी प्रार्थना है कि हे प्रभु! आप उस चोर का साथ क्यों दे रहे हैं? क्या आपको भी उस चोर से डर है? सुनते हैं कि आप निर्लिप्त हैं तो फिर चोरों के साथ लिप्त कैसे हो गए?
।। श्री परमात्मने नमः।।

Friday, 3 November 2017

कामवासना

आदमी मरते-मरते दमतक यानि आखिरी क्षण तक भी जब मौत द्वार पर दस्तक दे रही हो तबतक भी कामवासना से पीड़ित होता है और साधारण आदमी नहीं बल्कि परम अद्वैत में आश्रय किया हुआ! जो परम अद्वैत में अपनी आस्था की घोषणा कर चुका है और मोक्ष के लिए उद्यत हुआ भी। वह जो कहता है हम मोक्ष की तरफ प्रयाण कर रहे हैं वह भी! पुरुष काम के वश होकर क्रीड़ा के अभ्यास से व्याकुल होता है, यही आश्चर्य है।
।। श्री परमात्मने नमः।।

Thursday, 2 November 2017

आश्चर्य

कसौटियों से गुजर कर ही सोने की परख होती है औरआग से गुजर कर ही सोना कुंदन बनता है।
'परम अद्वैत में आश्रय किया हुआ और मोक्ष के लिए भी उद्यत हुआ पुरुष काम के वश होकर क्रीड़ा के अभ्यास से व्याकुल होता है—यही आश्चर्य है।'
।। श्री परमात्मने नमः।।

Wednesday, 1 November 2017

सुख की तलाश

एक आदमी भोग में पड़ा है वह धन इकट्ठा करता है और सुंदर स्त्री की तलाश करता है। एक स्त्री सुंदर पुरुष को खोजती है। आदमी बड़ा मकान बनाता है। उससे पूछिए वह बड़ा मकान क्यों बना रहा है? वह कहता है, इससे सुख मिलेगा। दूसरा आदमी सुंदर मकान छोड़ देता है पत्नी को छोड़ कर चला जाता है। घर-द्वार से अलग हो जाता है। नग्न भटकने लगता है। संन्यासी हो जाता है। उससे पूछिए तुम यह सब क्यों कर रहे हो? वह कहेगा, इससे सुख मिलेगा। दोनों की आकांक्षा सुख की ही है और दोनों मानते हैं कि सुख को पाने के लिए कुछ किया जा सकता है। यही भ्रांति है। सुख स्वभाव है। उसे पाने के लिए मनुष्य जब तक कुछ करेगा तब तक उसे खोता रहेगा। पाने की चेष्टा में ही उसे गंवाया है। संसारी एक तरह से गंवाता है और त्यागी दूसरी तरह से गंवाता है। दोनों किस भांति गंवाता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
।। श्री परमात्मने नमः।।